क्या मिलता है वारिसों को…

जब तक तोड़ेंगे नहीं तब , तक छोड़ेंगे नहीं

शायद ही कोई होगा, जो ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी को नहीं जानता होगा. ना सिर्फ़ उन पर कई फिल्में बनीं, बल्कि उनके नाम पर अस्पताल, और सड़क तक बनाए गए हैं. यहां उन्हीं दशरथ मांझी की बात हो रही है, जिन्होंने प्यार के खातिर पहाड़ को काट रास्ता बना डाला था. दुर्भाग्य से आज उनका परिवार कर्ज में डूबा हुआ है. उनके पास ना काम है, ना ही गुजारा करने के लिए पैसे. परिवार ने दशरथ मांझी की दो साल की नातिन पिंकी के लिए कर्ज लिया था, जिसे चुकाने की हालात में फिलहाल वो नहीं है. नातिन पिंकी को अभी भी इलाज की ज़रूरत है. मगर उसके परिवार के पास पैसे नहीं हैं. मिली जानकारी के मुताबिक, लॉकडाउन ने दशरथ मांझी के नाती का काम छीन लिया और वो मद्रास से अपने घर लौटने को मज़बूर हो गए थे.इसी बीच दो साल की पिंकी कुमारी एक रोड एक्सीडेंट का शिकार हो गई. इस दुर्घटना में उसका एक हाथ और एक पैर टूट गया था. जिसके इलाज के लिए पैसों की ज़रूरत थी. मज़बूरन परिवार वालों को गांव के संपन्न लोगों से कर्ज लेना पड़ा था. अब चूंकि, दशरथ मांझी का नाती अभी भी बेरोजगार है, इसलिए उसके पास कर्ज चुकाने तक के पैसे नहीं है. पूरा परिवार एक-एक पैसे का मोहताज हो गया हैं. अब उन्हें बस सरकार से मदद की उम्मीद है. बताते चलें कि माउंटेन मैन के बेटे भगीरथ मांझी को वृद्ध पेंशन का लाभ मिलता था, जोकि अब बंद हो चुका है. वहीं, बॉलीवुड फिल्म निर्माताओं की तरफ से दशरथ मांझी पर बनी फिल्म की रॉयल्टी के रूप में उनके परिवार को कुछ नहीं दिया गया. जैसे-तैसे ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी का परिवार अपना जीवन यापन कर रहा था. इसी बीच कोरोना लॉकडाउन का ऐलान हो गया और उनके सामने भुखमरी का संकट खड़ा हो गया.

दशरथ मांझी, एक ऐसा नाम जो इंसानी जज़्बे और जुनून की मिसाल है.

वो दीवानगी, जो प्रेम की खातिर ज़िद में बदली और तब तक चैन से नहीं बैठी, जब तक कि पहाड़ का सीना चीर दिया.जिसने रास्ता रोका, उसे ही काट दिया:बिहार में गया के करीब गहलौर गांव में दशरथ
मांझी के माउंटन मैन बनने का सफर उनकी पत्नी का ज़िक्र किए बिना अधूरा है. गहलौर और अस्पताल के बीच खड़े जिद्दी पहाड़ की वजह से साल 1959 में उनकी बीवी फाल्गुनी देवी को वक़्त पर इलाज नहीं मिल सका और वो चल बसीं. यहीं से शुरू हुआ दशरथ मांझी का इंतकाम.

22 साल की मेहनत

पत्नी के चले जाने के गम से टूटे दशरथ मांझी ने अपनी सारी ताकत बटोरी और पहाड़ के सीने पर वार करने का फैसला किया. लेकिन यह आसान नहीं था. शुरुआत में उन्हें पागल तक कहा गया. दशरथ मांझी ने बताया था, ‘गांववालों ने शुरू में कहा कि मैं पागल हो गया हूं, लेकिन उनके तानों ने मेरा हौसला और बढ़ा दिया’.

अकेला शख़्स पहाड़ भी फोड़ सकता है!

साल 1960 से 1982 के बीच दिन-रात दशरथ मांझी के दिलो-दिमाग में एक ही चीज़ ने कब्ज़ा कर रखा था. पहाड़ से अपनी पत्नी की मौत का बदला लेना. और 22 साल जारी रहे जुनून ने अपना नतीजा दिखाया और पहाड़ ने मांझी से हार मानकर 360 फुट लंबा, 25 फुट गहरा और 30 फुट चौड़ा रास्ता दे दिया।

दुनिया से चले गए लेकिन यादों से नहीं!

दशरथ मांझी के गहलौर पहाड़ का सीना चीरने से गया के अतरी और वज़ीरगंज ब्लॉक का फासला 80 किलोमीटर से घटकर 13 किलोमीटर रह गया. केतन मेहता ने उन्हें गरीबों का शाहजहां करार दिया. साल 2007 में जब 73 बरस की उम्र में वो जब दुनिया छोड़ गए, तो पीछे रह गई पहाड़ पर लिखी उनकी वो कहानी, जो आने वाली कई पीढ़ियों को सबक सिखाती रहेगी.दशरथ मांझी ने असंभव काम को करके अपनी पत्नी को ऐसा तोहफा दिया जो कि अविस्मरणीय है।

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