गरीबों के लिए नहीं है कोई सरकार!

पटना । ‘गरीबों को कोई नहीं देखता है’ यह कहना था मांडवी देवी का जो भागलपुर जिले में सुल्तानगंज प्रखंड के कटहरा पंचायत की पनसल्ला ग्राम निवासी हैं.


पटना के नूतन राजधानी अंचल से लागू की जाने वाली सरकारी योजनाएं यंहा आकर दम तोड़ती नजर आती है. जंहा न तो मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना “पक्की नली-गली योजना” है न ही कोई और योजना. फूस के घर मे रहने वाली मांडवी देवी ने बताया कि उन्हें ‘इंदिरा आवास योजना’ का लाभ भी नहीं मिला है.


इसी ग्राम की इन्दु देवी कहती हैं कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए 15 किलोमीटर दूर सुल्तानगंज या 30 किलोमीटर दूर भागलपुर जाना पड़ता है. सरकारों का न होना बताता है कि सरकारों के लिए उनकी जनता महज वोट हैं. इन्दु देवी लकड़ियों के लिए एक स्कूल की इच्छा करती है, अपनी सरकार से यह इच्छा करना गुनाह तो नहीं है न?
“हम मजदूर हैं मजदूरी करके कमाते-खाते हैं” कहने वाली पमपम देवी फूस की झोपड़ी में रहती हैं जंहा न तो सरकारी योजनाएं पहुंची न ही सरकार.


सरकार सिर्फ दीवारों के नारों में दिखती है हकीकत में नहीं. शाहकुंड प्रखंड के माणिकपुर ग्राम में अजीत कुमार सिंह के घर में चलने वाले स्वास्थ्य उपकेंद्र के दीवारों पर लिखा है कि तीन दिन ओपीडी की सुविधा मिलेगी,पर मिलता है सिफर. माणिकपुर, हरिजन टोला के शंकर दास बताते हैं कि की पांच सौ की आबादी बिना सड़क – बिना गली के जीने और मरने को अभिशप्त हैं. सरकारें आईं और गईं पर हालात जस के तस हैं. इसी गांव में मनोरमा देवी रहती हैं जिनके पति दिव्यांग हैं न कोई सरकारी सहायता न कोई सरकार.


बगाँय, शाहकुंड के लोग कहते हैं कि जो जीतकर जाता है फिर वापिस नहीं आता है, न सरकार है न सरकारी अमला. यह बात बकचप्पर में भी उतनी ही सच है. न स्वास्थ्य की मूलभूत सुविधाएं न आधारभूत सुविधाएं.


बात किसी जगह की हो एक चीज सामान्य है सरकारें हर जगह से गायब हैं. इस क्षेत्र के लोग कहते हैं कि भागलपुर नेतृत्व विहीन है पर ऐसा लगता है कि यह क्षेत्र सरकार विहीन है. अब पॉलिटिक्स पटना में बैठकर नहीं होनी चाहिए क्योंकि पटना की सरकारें यंहा दिखती नहीं.

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