बिहार में फिर बाढ़ की आहट, अक्षम सरकार से पुष्पम प्रिया चौधरी ने माँगा हिसाब

पटना : दर साल सरकारें बदली पर नहीं बदली तो बिहार, बाढ़ और उसकी विभीषिका से उभरने वाला विस्थापन और पलायन से दर्द का रिश्ता. बिहार में मानसून के बाद बाढ़ का आना एक बड़ा सच है परंतु इस विभीषिका को पालने-पोसने में सरकारों की महती भूमिका है यह उससे भी बड़ा सच है. बाढ़ जैसी आपदा संस्थागत सरकारी लूट का वार्षिक उपक्रम है जिसका इंतज़ार बिहार की सरकारों को हमेशा रहता है. प्लुरल्स पार्टी की प्रेसिडेंट और मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार सुश्री पुष्पम प्रिया चौधरी ने बिहार सरकार पर ज़ोरदार हमला किया है. उन्होंने सरकार से पिछली वायदों और उसके क्रियान्वयन को लेकर हिसाब माँगा है और कहा है कि सरकार कब अपनी ज़िम्मेवारी समझेगी.

बाढ़ की समस्या को प्रकृति की आपदा मानकर सरकार अपने कार्यों की इतिश्री कर लेती है. बाढ़ के लिए सरकार कभी नेपाल तो कभी अत्यधिक बारिश तो कभी नदियाँ और जब कुछ नहीं होता तो नक्षत्रों को खलनायक बना दिया जाता है. बाढ़ जैसे आदिम समय की समस्याओं को लेकर सरकार कब सजग होगी. उन्होंने कहा कि सरकार सिर्फ़ सरकारी विज्ञापनों में ख़ूबसूरत है जबकि यथार्थ  में बेबस और बदहाल बिहार.


बिहार सरकार द्वारा ज़मीनी हक़ीक़त से दूर होने और सिर्फ़ ‘फ़ाइलों में मौसम गुलाबी’है की सोच को आड़े हाथों लेते हुए अपने फ़ेसबुक पोस्ट पर लिखा है कि “बिहार में डिज़ास्टर मैनेजमेंट डिज़ास्टर आने के बाद शुरू होता है.मैनेज सिर्फ़ छवि हो पाती हैं बाक़ी डिज़ास्टर जस-का-तस! पॉलिसीमेकिंग और इम्पलीमेंटेशन का एक उदाहरण लीजिये:- 2008 की कोसी बाढ़, सीएम रिलीफ़ फंड में 250 करोड़ चंदा लिया गया, घोषणा हुई कि 110 “बाढ़ आश्रयणी स्थल” के बड़े-बड़े भवन बनाये जाएँगे उत्तर बिहार में ताकि बाढ़ कैम्प न लगाना पड़े. नतीजा? बीरपुर बराज फिर कोसी का मिज़ाज बता रहा है, लोग बेघर होने शुरू हैं और घोषणा वाले भवन फ़ाईलों के टेंडर में दर-बदर! दुनियाँ में लोगों ने समंदर में शहर डाल दिये, नदियों का रास्ता बदल दिया और यहाँ 50 साल में बांध-नहर की एक योजना बनती है और उद्घाटन के अगले दिन टूट जाती है! दोष देने को नदियां, नेपाल और नक्षत्र हैं ही. अब बाढ़-सूखा जैसी आदिम जमाने की समस्याओं से मुक्ति का समय है”.


सुश्री चौधरी ने इसके साथ कोशी बैराज का 40 सेकेंड का वीडियो जारी किया है जो शाम 7:11 शाम का बजे कोशी बैराज के फ़ेसबुक पेज पर पोस्ट किया गया था.
‘बिहार का शोक’ कही जाने वाली कोसी नदी में जल का जो प्रवाह दिख रहा है उससे कोसी के जलस्तर बढ़ने की संभावना है इससे नदी के तटबंधों के भीतर रहने वाली एक बड़ी आबादी को विस्थापन का दर्द झेलना पड़ेगा.
साल दर साल सरकारों से सिर्फ़ वायदे मिले सिर्फ़ आश्वासन मिला पर नहीं मिला तो बाढ़ और  विस्थापन से उपजी दर्द का दंश. इसी मुद्दे पर प्लुरल्स की प्रेसिडेंट पुष्पम प्रिया चौधरी ने सरकार को घेरा है और उनके कामों का हिसाब माँगा है.
“प्यासी पथराई उदास आँखें/ थकी बे-आसरा निराश आँखें/कोई भी तो अपना रूख फेरे उसकी ओर/ कोई तो उठाये अपनी आँखों का पर्दा” (नागार्जुन). सरकार को अब अपनी आँखों से पर्दे को हटाना होगा, पुष्पम प्रिया चौधरी सरकार से हिसाब माँग कर यही कर रही है.

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