वायदों का बाज़ार, फिर हुआ गुलज़ार

नियोजित शिक्षकों को फिर से ठगने की तैयारी

पटना ।‌ बिहार में बाढ़ और कोरोना की महामारी के बीच चुनाव आयोग द्वारा चुनाव के लिए तैयार होने की घोषणा ने राज्य में सरगर्मी बढ़ा दी है. अब चुनावी वायदों का मौसम फिर से गुलजार होते जा रहा है. सत्ता के कलाकार अपने पिटारों से वायदों की डुगडुगी बजाने लगे हैं, नई-नई करतब दिखाने-बताने लगे हैं और रिझाने लगे हैं अपने वोटरों को.


“अब जब भगवान ही धरती पर उतरेंगे तभी आपको वेतनमान मिल सकता है, मेरी सरकार से कतई उम्मीद न करें” कहने वाले अब उम्मीद दिला रहे हैं और नई सेवा शर्तों के साथ नया जाल फेंका है. ऐसा क्या हो गया कि लगभग 4 लाख नियोजित शिक्षकों के प्रति बिहार सरकार की नजरें इनायत होती दिख रही है.वायदों का मौसम शुरू हो गया शायद!


“हम आपको नियमित शिक्षकों के बराबर वेतनमान नहीं दे सकते क्योंकि बिहार में और भी काम करने हैं” कि बोल बोलने वाले अब बातों के जाल बुनने-फेंकने शुरू कर चुके हैं. नियोजित शिक्षकों के लिए नई सेवा शर्त नियमावली लागू करने की घोषणा का जाल बुना जा चुका है. अब देखना है कि इस जाल में नियोजित शिक्षक फंसते हैं या नहीं?
चुनावी काल में नियोजित शिक्षकों को अपने तरफ करने की कोशिश में सरकार “वायदों के लॉलीपोप” दे रही है. “नियोजित शिक्षकों के प्रति सरकार संवेदनशील है लेकिन समान कार्य के बदले समान वेतनमान नहीं देगी” के राग गाने वाले अब बेहतर सेवा शर्त दे रहे हैं”.


कल तक जो सरकारें नियोजित शिक्षकों को दोयम दर्जे का शिक्षक समझ रहे थे उनपर लाठी-डंडा चलवा रहे थे आज कह रहे हैं कि “हमने तो नहीं कहा कि ये शिक्षक नियोजित हैं हम तो कहते हैं कि ये नियोजित नहीं बल्कि सिर्फ शिक्षक हैं. ये लोग पता नहीं कंहा से चलाते रहते हैं कि नियोजित शिक्षक हैं”. यह बदलता राग बताता है कि बदले-बदले से सरकार नजर आ रहे हैं. आखिर यह बदलाव क्यों है? चुनाव नजदीक है और वायदों का बाजार फिर से खुल गया है.
सरकार ने यह वादा किया है कि शिक्षकों का वेतन वृद्धि 1 अप्रैल 2021 से करेगी, पर सवाल यह है कि “पोस्ट डेटेड चेक” का वायदा क्यों कर रही हैं? अगर सरकार की नीति और नीयत साफ होती तो 1 अप्रैल 2020 या उससे पीछे के वर्षों से वेतन वृद्धि क्यों नहीं कर रही है सरकार!


ऐसा माना जाता है कि इतिहास अपने को दोहराता है, बिहार की राजधानी इतिहास के उस पन्ने को फिर से दुहराने के कगार पर है जंहा मगध के राजा घनानंद ने एक शिक्षक चाणक्य का अपमान किया था. सरकार ने बिहार के 69911 प्राथमिक विद्यालयों के लगभग 4 लाख शिक्षकों का अपमान किया है. वक़्त है शिक्षकों द्वारा इतिहास को फिर से दोहराने का और एक नए बिहार के सर्जन का. शिक्षकों को अपनी नई भूमिका में आना ही होगा.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

0Shares
0