सीमांचल के मक्का उत्पादक किसान लाचार : पुष्पम प्रिया चौधरी

  • रिकार्ड उत्पादन पर सरकार ने की अनदेखी

पटना : बिहार मक्के का प्रमुख उत्पादक राज्य होने के बाद भी सरकार किसानों की अनदेखी करती रही है. उन्हें न तो प्रोसेसिंग प्लांट की सुविधा मिली, न ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद की सुविधा. मक्का उत्पादक किसानों से मिलने के बाद प्लुरल्स पार्टी की प्रेसिडेंट पुष्पम प्रिया चौधरी ने किसानों की दुर्दशा के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि “बिहार सरकार का अपना संविधान है. भारत सरकार की घोषणा के बावजूद राज्य की तीसरी सबसे प्रमुख फसल मक्का पर न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू नहीं की जाती! केंद्रीय दर प्रति क्विंटल लागत ₹1213 हैऔर घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹1760 है परंतु बिहार में बाज़ार भरोसे किसानों को ₹1000 भी नहीं मिलते हैं. उत्तर बिहार के मक्का किसान इस साल बर्बाद हो गए. उन्होंने मक्का फेंक दिया. आंध्रप्रदेश और कर्नाटक जैसे बड़े उत्पादकों पर भी लॉकडाउन का असर हुआ लेकिन सरकारों ने तुरंत एमएसपी पर ख़रीद सुनिश्चित की, लेकिन बिहार? यक़ीन नहीं होता कि यहाँ चुनी हुई सरकार है! किसान सत्याग्रह पर बैठे, माँगे रखीं, केंद्रीय एजेंसियों ने भी अनुरोध किया, लेकिन क्या मजाल कि बिहार सरकार मान जाए!” बिहार में सीमांचल के जिले मक्का उत्पादन का मुख्य के केंद्र है फिर भी किसानों की व्यथा पर सरकार ध्यान तक नहीं देती है.

पुष्पम प्रिया चौधरी ने कहा कि “यह सरकार निरंकुशता और अक्षमता का पर्याय बन गई है अब इन सरकारों को उखाड़ फेंकने का समय आ गया है अब सब बदलने का समय है”.

किसानों की समस्याओं बोला कि “बिहार में मक्के के प्रोसेसिंग सेंटर के अभाव में हाइवे ही किसानों का आसरा बन जाते हैं. ये मकई नहीं गोल्ड के दाने हो सकते हैं बशर्ते कि इनकी स्टोरेज और प्रोसेसिंग खगड़िया पूर्णिया ,मधेपुरा,किशनगंज, अररिया जैसे भारी उपजाऊ ज़िलों में मॉडर्न प्रोसेसिंग प्लांट में हो न कि हाइवे और सड़कों पर”.
दुनिया में सबसे अधिक खाई जाने वाली इस फसल के उत्पादक किसान इस बार तो आशंकित भी हैं कि कोरोना काल में फसल के दाम नहीं मिलेंगे. बिहार में इस साल 2019-20 में 35 लाख टन मक्के का उत्पादन होने का अनुमान लगाया गया था, यह पिछले साल के लगभग 10 प्रतिशत अधिक है. इस साल किसानों पर दोहरी मार पड़ी है एक तरफ मक्के का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है तो दूसरी तरफ कोरोना के कारण औधोगिक मांग कम हो गई है. इस साल मांग कम और आपूर्ति अधिक होने से बाजार के नियम बदल गए और अर्थशास्त्र के इस नियम परिवर्तन ने किसानों हेतु अनर्थशास्त्र की दुखद त्रासदी की शुरुआत कर दी है.
पुष्पम प्रिया चौधरी ने सीमांचल के किसानों की समस्याओं और उनके दर्द को समझा और वादा किया कि उनकी सरकार में मॉडर्न प्रोसेसिंग प्लांट से मक्के के सुनहले दानों की तरह किसानों का जीवन भी सुनहला हो जाएगा.

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