Kargil Vijay Diwas : बलिदानी की बेटी ने लिखी लेटर्स फ्रॉम कारगिल, यह शहीदों के शौर्य व पराक्रम की गाथा

Patna : कारगिल युद्ध में शहीद मेजर चंद्रभूषण द्विवेदी की वीरता देशभक्ति का जज्बा भर देती है। वे शिवहर जिले के पुरनहिया प्रखंड स्थित चंडीहा गांव के रहने वाले थे। उनकी बिटिया दीक्षा द्विवेदी ने ‘लेटर्स फ्रॉम कारगिल’ नामक अपनी पुस्तक में अपने पापा के शौर्य व पराक्रम की गाथा बयां की है। साथ ही अन्य शहीद परिवारों से मिलकर उनके पत्र और अनुभवों को भी इस पुस्तक में समाहित किया है।

हमेशा पत्र लिखकर करते थे मार्गदर्शन

जब दीक्षा के पिता शहीद हुए थे, तब वह महज आठ साल की थी। बड़ी बहन नेहा 12 साल की। आज नेहा एमबीबीएस डॉक्टर हैं। उनकी शादी सेना में कार्यरत देहरादून निवासी रोहिणी छिब्बर से हुई है। मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई के बाद एक कंपनी में कार्यरत दीक्षा लेखिका हैं। वह अपने पिता को रियल हीरो मानती हैं। बताती हैं कि पिता परिवार को खत लिखना कभी नहीं भूलते थे। परीक्षा की तैयारी के समय व पढ़ाई के लिए हमेशा पत्र लिखकर मार्गदर्शन करते थे। मां को लिखी हुई उनकी आखिरी चिट्ठी कुछ ऐसी थी- ‘डिअर भावना! टीवी पर दिखाई गई बहुत सारी न्यूज सही होती है, पर बहुत सी अफवाह भी। इसलिए उसपर पूरी तरह यकीन मत करना।भगवान पर भरोसा रखना’। ये उनके शहीद होने के दो दिन पहले लिखा गया खत था। दीक्षा ने कैप्टन सौरभ कालिया, कैप्टन अमित भारद्वाज, मेजर राजेश सिंह अधिकारी, मेजर चंद्र भूषण द्विवेदी, कैप्टन मनोज कुमार पांडे, कैप्टन अनुज नय्यर, कैप्टन विक्रम बत्रा, मेजर पद्मापानी आचार्य, मेजर रितेश शर्मा के परिवारवालों से पत्र जुटाकर पुस्तक में संग्रहित किया है।

ज्यादा खून बहने के कारण हुए शहीद

दीक्षा बताती हैं कि ऑपरेशन विजय में उनके पिता की रेजिमेंट जब द्रास में पहुंची तो उनपर गोले बरसने लगे थे। दुश्मन कहां थे, इसकी जानकारी नहीं थी। बहुत प्लानिंग करते हुए वे आगे बढ़े थे। दो जुलाई की शाम पापा को यह फैसला लेना था कि फायरिंग करते रहें, या रुक जाएं। सबसे ऊंची चोटी टाइगर हिल पर पाकिस्तानी गोलीबारी का मुंहतोड़ जवाब देते हुए अपनी बटालियन के साथ वीरता से लड़े। दुश्मनों का सामना करते हुए एक बम उनके बगल में आकर गिरा। हाथ में गोली लगी। साथियों को बंकर में जाने का आदेश दिया। ज्यादा खून बहने के कारण दो जुलाई 1999 को शहीद हुए।

पिता से वह अंतिम मुलाकात

पिता श्रीनगर में तैनात थे। मां भावना द्विवेदी व हम बच्चों को घुमाने के लिए श्रीनगर बुलाया था। 13 मई 1999 को हम लोग एयरपोर्ट पहुंचे थे। इसी बीच उनका ट्रांसफर कारगिल के लिए हो गया। एयरपोर्ट पर ही हमलोग से मुलाकात कर 12 घंटे के अंदर कारगिल के लिए प्रस्थान कर गए। यह आखिरी मुलाकात थी। एयरपोर्ट से ही हमें मेरठ जाना पड़ा, जहां शिक्षा-दीक्षा हो रही थी।

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