मृत्युभोज की जगह जरुरतमंदों की मदद कर देना, फौजी की थी अंतिम इच्छा

नालन्दा (बिहार) – हरनौत प्रखंड मुख्यालय के हरनौत बाजार स्थित बिस्कोमान गली निवासी व भारतीय सेना में 28 वर्षों तक सेवा देने वाले फौजी मदन कुमार सिंह की मौत भी यादगार बन गई। इसलिए नहीं कि उनकी मृत्युभोज में खाने वालों का रिकॉर्ड बना, बल्कि इसलिए कि उनके फौजी बेटे ने उनकी मृत्युभोज नहीं कराकर जरुरतमंदों को मदद देने की उनकी अंतिम इच्छा पूरी की। मृतक के बेटे ज्योति कुमार खुद भी फौजी हैं। वर्तमान में वे झांसी के बबीना कैंट में हैं।


पिछले माह फौजी पिता को टाइफाइड हो गया था। काफी इलाज के बाद भी ठीक नहीं हुये। उनकी कोरोना जांच की रिपोर्ट भी निगेटिव थी। उनके बेहतर इलाज के लिए दूसरे प्रदेश ले जाने की पुर्व संध्या उन्होंने प्राण त्याग दिया।

बेटे ने बताया कि वे 28 वर्ष तक भारतीय सेना और फिर 16 वर्ष तक सैफ इंस्पेक्टर के रुप में राज्य में योगदान दे चुके थे।
बीमारी के गंभीर रुप लेने के पहले तक वे नियमित रुप से अपनी डेढ़ बीघा में लगे बाग की बागवानी खुद करते थे। वे मृत्युभोज के विरोधी थे। वे कहते थे कि यह कैसी परंपरा है कि बीमार होने पर इलाज को रुपये नहीं जुटते हैं और मरने पर भोज में हजारों-लाखों रुपये बेवजह खर्च किये जाते हैं।

मृतक फौजी की इन्हीं भावनाओं को समझकर उनके फौजी बेटे ने ग्यारह ब्राह्मणों को प्रसाद वितरण कर दक्षिणा देकर क्रियाकर्म पूरा किया। इसी दौरान दो अगस्त को ज्योति को सिक्किम में सीमा पर कमान संभालनी थी। पर, पिता की मौत और क्रियाकर्म पूरा कर अब वे कमान संभालेंगे।
उनके इस कार्य की सराहना करने वालों में डॉ अशोक कुमार, तरुण सिंह, मुकूल सिंह, कुंदन कुमार, सकलदेव यादव, पुटूश शर्मा शामिल हैं।

रिपोर्ट – गौरी शंकर प्रसाद

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