सिवान के पौराणिक-ऐतिहासिक स्थल “दोन” गुमनामी में बर्बाद होने के कगार पर : पुष्पम प्रिया चौधरी

गुमनामी में है कई धार्मिक मान्यताओं वाला स्थल

सिवान । “सिवान में कई पौराणिक-ऐतिहासिक स्थल हैं जो गुमनामी में खो जाने के कगार पर हैं. जिले में इस तरह के कई स्थल हैं जिनका न तो ठीक तऱीके से उत्खनन किया गया न तो ठीक तरीके से इतिहास लेखन किया गया. अगर बिहार सरकार इन स्थलों का उत्खनन करके इनको विकसित करती तो राज्य की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत परंपरा और अधिक समृद्ध होती परंतु बिहार सरकार की अकर्मण्यता ने “दोन” जैसे पौराणिक-ऐतिहासिक स्थल को भी गुमनामी के अंधेरे में ढकेल दिया है” यह बात प्लुरल्स पार्टी की प्रेसिडेंट पुष्पम प्रिया चौधरी ने इस स्थल का निरीक्षण करने के बाद कही.

“सिवान की शुरुआत ‘महाभारत’ व ‘धम्म’ के गुरुओं’ के आशीर्वाद से हुई. एक युद्ध के गुरु और एक ज्ञान के गुरु हैं. द्रोणाचार्य चक्रव्यूह बनाते हैं और गौतम बुद्ध चक्रव्यूह से निकालते हैं, लेकिन सिवान के दरौली विधानसभा के दोन गाँव में दोनों महारथी बिहार सरकार की शिखंडी नीति से चित्त पड़े हैं! पुराण बताते हैं कि महान अर्जुन के महान गुरु द्रोणाचार्य इसी गाँव के थे जबकि ‘महापरिनिब्बान सुत्त’, ह्वेनसांग और फाह्यान बताते हैं कि बुद्ध की अस्थियाँ यहाँ के स्तूप में गड़ी पड़ी हैं. कुछ विद्वानों का यहाँ तक मानना है कि बुद्ध की मृत्यु कुशीनारा में नहीं, यहीं सिवान में हुई थी. इतने इतिहास और इतने तथ्य अगर दुनियाँ के किसी और कोने में होते तो यह जगह आज पूरी हिंदू और बौद्ध संस्कृति और पर्यटन का केंद्र होता! लेकिन अब यहाँ संस्कृति का नामोनिशान तक नहीं है, न यह पुरातत्व का केंद्र बना और न ही बुद्ध सर्किट का हिस्सा, क्योंकि राज करने वाले और राजनीति बनाने वाले संस्कारहीन हैं, शौर्यहीन और ज्ञानहीन भी, न वे द्रोण के शिष्य बनने लायक़ हैं और न बुद्ध के. सिवान के बदलने की शुरुआत दोन के संस्कार की स्थापना से होगी, इसको धर्म-कर्म-अर्थ का केंद्र बनाकर होगी!” प्लुरल्स पार्टी की प्रेसिडेंट पुष्पम प्रिया चौधरी ने “दोन” यात्रा के बारे में बताया.


सिवान के दारौली क्षेत्र में स्थित दोन में एक किले के खंडहरनुमा ढांचा जिसके बारे में बताया जाता है कि महाभारत में महान गुरु द्रोणाचार्य का था, जो कौरवों और पांडवों को पढ़ाते थे. प्लुरल्स पार्टी की प्रेसिडेंट पुष्पम प्रिया चौधरी ने “दोन” यात्रा के बारे में बताया
एक दूसरी मान्यता द्रोणाचार्य के बेटे अश्वत्थामा के बारे मे बताया जाता है कि पांडवों के पुत्रों की हत्या के लिए कृष्ण द्वारा दिये गए शाप के कारण पृथ्वी पर अभी भी भटक रहा है.

महापरिनिर्वाण सुत्त के अनुसार दोन बौद्ध परंपरा में भी स्थान रखता है. दोन एक स्तूप के लिए भी जाना जाता है, ऐसी मान्यता है कि दोन एक स्थानीय ब्राह्मण का नाम था, जिसने बुद्ध के अंतिम अनुयायियों जिसमें बुद्ध की अस्थि वितरित की जा सकती थी के बीच एक पात्र मे रखी हुई बुद्ध की अस्थि विवाद को हल करने मे सहायता प्रदान की थी. इसी मध्यस्थता को आभार के प्रतीक के रूप में, वह पात्र दोन को दिया गया था. उन्होंने पात्र के लिए एक स्तूप बनाया. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा विवरण में दोन के बारे में उल्लेख किया है.


ऐसी भी मान्यता है कि बुद्ध ने अंतिम सांस यंही ली थी.
इसी स्थल के पास बौद्ध धर्म परंपरा में बुद्ब की पत्नी मानी जाने वाली तारा का मंदिर है जो अपनी गुमनामी के दौर में है. ऐतिहासिक साक्ष्यों में ऐसा कहा गया है कि तारा की जो मूर्ति मिली थी वह बेहद कलात्मक संरचनाओं वाली थी परंतु वर्तमान में यह गायब है. सवाल यह है कि अगर तारा की कलात्मक सौंदर्य मूर्ति का उल्लेख मिलता है तो यह कंहा है?

प्लुरल्स पार्टी की प्रेसिडेंट पुष्पम प्रिया चौधरी ने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि “एक तो सरकारों ने उत्खनन ठीक तरीके से नहीं किया और दूसरी तरफ उसी पौराणिक-ऐतिहासिक मान्यताओं वाले स्थल पर राजकीय मध्य विधालय स्थापित कर दिया”.
बिहार सरकार की विरासतों और धरोहरों के प्रति उपेक्षा ने कई ऐतिहासिक-पौराणिक मान्यताओं वाला “दोन” को बर्बादी के कगार पर लाकर छोड़ दिया है.

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