चन्द्रशेखर सिंह की स्मृति में केदारभवन में कार्यक्रम किया गया ।

  1. कृषि कानूनों के माध्यम से पूंजीपतियों के नवउदारवादी एजेंडा को आगे बढ़ाया जा रहा है।
    2.किसानों ने तो मांग नहीं की थी फिर क्यों कृषि कानूनों लाये गए ?

    पटना, 6 जनवरी। केदारदास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान द्वारा जननायक व कम्युनिस्ट नेता चंद्रशेखर सिंह की स्मृति में केदार भवन में विमर्श आयोजित किया गया। विमर्श का विषय था- ‘समकालीन किसान आंदोलन का नया दौर: मुद्दे व प्रभाव’। चंद्रशेखर सिंह की स्मृति सभा में बड़ी संख्या में विभिन्न किसान संगठनों के कार्यकर्ता, समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय अग्रगामी लोग मौजूद थे।
    सर्वप्रथम चंद्रशेखर सिंह की तस्वीर पर माल्यार्पण किया गया। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए केदारदास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान के महासचिव नवीनचंद्र ने कहा ” 19वीं शताब्दी का उदारवाद सफल रहा था लेकिन जो उस उदारवाद का आधुनिके संस्करण नवउदारवाद असफल हो गया है। ये लोग कहा करते थे कि व वैश्वीकरण के एजेंडा को नहीं लागू कर सकते क्योंकि लोकतांत्रिक दबाव रहता है। अतः ऐसी सरकार लाई गई जो लोकतांत्रिक मांगो को कुचल कर नवउदारवादी कार्यक्रम को लागू कर रही है। वर्तमान कृषि कानून उसी एजेंडा को लागू करने की दिशा में कदम है। “

स्मृति सभा में ए. एन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ विद्यार्थी विकास ने 19 वीं सदी से ही चले रहे किसान आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा” किसान आंदोलन में हिस्सा सिर्फ किसान ही नहीं बल्कि वकीलों ने बढ़चढ़ कर लिया है। जैसे महात्मा गांधी और सरदार पटेल। आज तो इनलोगों को अर्बन नक्सल कहे दिए जाते। स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने जमींदारों के खिलाफ संघर्ष किया था उसी प्रकार आज कॉरपोरेट जमींदारों के विरुद्ध लड़ाई चल रही है। किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि से 1857 का प्रथम विद्रोह और भारत का स्वाधीनता आंदोलन चला था। स्वामी सहजानन्द, कार्यानन्द शर्मा आदि के नेतृत्व में बकाश्त संघर्ष चला। भूदान आंदोलन को पुराने बिहार में 22 लाख एकड़ में मिली थी। जयप्रकाश नारायण ने भी किसान आंदोलन में हिस्सा लिया था।”
डॉ विद्यार्थी विकास ने का केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई तीनो कृषि कानूनों की व्याख्या करते हुए उदाहरणों के साथ बताया कि सरकार कैसे अडानी जैसे उद्योगपति के हितों के लिए कृषि कानूनों को लाई है। साथ में यह भी जोड़ा ” केंद्र सरकार के कद्दावर मंत्री नीतीन गडकरी यह कहते हैं कि भारत मे एम.एस. पी ज्यादा है। अपने यहां पानी 20 रुपये, नमक 25 रु किलो बिक सकता है लेकिन अनाज को धान व गेहूं को उतनी कीमत भी नहीं प्रदान किया जाता है।”
बिहार में मंडी सिस्टम समाप्त होने के नुकसानों के बारे में बताया कि” मंडी सिस्टम के समाप्त होने के कारण 7 हजार करोड़ का नुकसान हुआ है। बिहार में तो किसानों को मंडी सिस्टम की उपलब्धियों का कोई अनुभव ही नहीं है। मोकामा ताल में एम.एस. पी को सुनिश्चित किया जाए और पानी की निकासी की व्यवस्था कर दी जाय तो अकेले मोकामा पूरे बिहार की दाल की खपत कर सकती है। बिहार में 97 प्रतिशत किसान छोटे किसान हैं यानी 1 एकड़ से पांच एकड़ के बीच के हैं। जबकि पंजाब में 33 प्रतिशत मार्जिनल किसान हैं। ” विद्यार्थी विकास ने आगे बताया कि ” बिहार में मात्र 3 प्रतिशत किसानों को ही एम.एस. पी का लाभ उठा पाते हैं। 2014 से लेकर एक पर एक जनविरोधी कानून लागू किये जा रहे हैं कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग, अचानक लौकडाउन, जीएसटी, सी.ए. ए जैसे कानून लेकर आ गई है। सरकार कृषि में निजी निवेश लाना चाहती है। सरकार ने सोचा था कि कोरोना के कारण कोई विरोध न कर सकेगा लेकिन केंद्र सरकार को भारत में किसान आंदोलनों का कोई अनुभव ही नहीं है।”
बिहार राज्य किसान सभा ( अजय भवन) के महासचिव अशोक कुमार सिंह ने बताया ” जो लोग ब्रिटिश पीरियड में अंग्रेजों और जमींदारों का आंदोलन कर रहे थे वे अब कॉपोरेट की दलाली जर रहे हैं। 1973 में चटरथवर्गीय का वेतन 185 से 18000 हो गया। तब गेहूं 85 रुपये था लेकिन उसे 8500 रु क्विंटल हो जाये तो बेहतर होगा। किसान देश के 130 करोड़ लोगों के पेट भरने का काम करते हैं उनका काम देश का काम नहीं बना जाता। किसान हाड़ तोड़ 16 घण्टा काम करने के बावजूद वह पेंशन नहीं प्राप्त करता लेकिन सरकारी कर्मचारी को दिया जाता है। किसानों को 18 हजार रुपया पेंशन मिलना चाहिए। पर्यावरण का जो विनाश विकसित देश कर रहे हैं उसका खामियाजा किसानों को उठाना पड़ता है। इसका मुआवजा उन्हें मिलना चाहिए। फसल बीमा उन्हें उपलब्ध होना चाहिए। धान जी खरीद में चारों ओर लूट मची हुई है। कालाबाजारी से बचने के लिए 1955 में आवश्यक वस्तु अधिनियम बनाया गया था केकिन आज उसे ही सरकार समाप्त करने ओर तुली हुई है।” अशोक कुमार ने आगे कहा ” आप गांवों में घूम जाइये कहीं भी किसान नहीं मिलेगा बल्कि भूमिहार, यादव, कुर्मी, हिन्दू, दलित, मुसलमान में बनता हुआ है। एक बड़ी साजिश के तहत किसानों कॉ जातियों में बांट दिया गया है। यह बिहार में बड़ी बाधा है।”
शिक्षाविद अनिल कुमार राय ने किसान आंदोलन के मुद्दों व प्रभावों के संबन्ध में कॉन्ट्रेक्ट खेती के लिए लैटिन अमेरिकी का उदाहरण देते हुए बताया ” ग्वातेमाला में कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग हुई थी । जी ग्वाटेमाला मक्के का 98 प्रतिशत उत्पादन करता था कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग के बाद उसमें 76 प्रतिशत की कमी आ गई क्योंकि उन चीजों का उत्पादन होने कगा जिसमें मुनाफा होता है। इसका उसका परिणाम वहां भुखमरी का शिकार हो गया। ग्वाटेमाला में 56 प्रतिशत लोग कुपोषण के शिकार हो गए हैं। इसके साथ ही मानवाधिकारों का हनन किस प्रकार जिया जा रहा है इसका भी उदाहरण ग्वाटेमाला हमें दिखाता है। एक ताकतवर व कमजोर व्यक्ति के बीच संबन्ध कभी भी बराबरी का नहीं हो सकता। वहां के कॉपोरेट ने अपने ही नागरिकों को चोर साबित कर दिया है । “
सामाजिक कार्यकर्ता व लेखक अक्षय कुमार ने कहा ” जितने भी अब तक आंदोलन हुए हैं वे व्यवस्था परिवर्तन के लिए हुए हैं। वर्तमान आंदोलन भी व्यवस्था में बदलाव के लिए है। या लड़ाई को मांग के नजरिये से नही देखना चाहिए। अंतराष्ट्रीय पूंजी की व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए आई.एम. एफ , वर्ल्ड बैंक ने कृषि को टारगेट किया था। ये तीनों कानून डंकल प्रस्ताव, गैट आदि का स्वाभाविक परिणाम है। ये बिहारवासियों के लिए कलंक की बात है कि 2006 में जिस एक्ट को खत्म किया गया उसका जबरदस्त विरोध नहीं कर पाया। लेकिन अब उस कलंक को धोया है।”
सी.पी.आई (एम.एल-क्लास स्ट्रगल ) के नेता अरविंद सिन्हा ने बहस को आगे बढाते हुए कहा ” किसान इतना अन्न उपजाता है कि सरकार उसे रख ही नहीं पाती है। यह सिर्फ किसानों के ही नहीं अपितु पूरे देश व समाज की समस्या है। जो कृषि कानून सरकार लेकर आई है उसकी तो किसानों ने मांग कभी नहीं की थी । फिर इस कानून की जरूरत क्या थी ? जब किसानो के आत्महत्या का मामला आया था तब आप क्या कर रहे थे। स्वामीनाथन कमिटी की सिफारिशें थी उसको क्यों नहीं लागू किया जिसमें लागत का डेढ़ गुणा न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात थी। लेकिन ये सब न करके बाकी चीजों की तरह कृषि को भी पूंजीपतियों और निजी क्षेत्र के लिए सौंप दिया जा रहा है। एफ.सी.आई को बहुत कम पैसा देती है ताकि सरकारी खरीद बन्द हो जाये। अडानी को गोदाम लीज पर देने की बात हो रही है।ये कॉपोरेट अनाज जमाकर मनमाने दाम पर बेचेंगे। और विदेशों में बेचेंगे मुनाफा कमाने के लिए भले उससे देश में लोग भूखे मरें।”
अधिवक्ता मदन प्रसाद सिंह, कौशलेंद्र, ओमप्रकाश सिंह ने भी संबोधित कियी
आगत अतिथियों का स्वागत केदारदास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान के अमरनाथ ने जबकि संचालन अशोक कुमार सिन्हा ने किया। इस अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता अक्षय कुमार द्वारा लिखित पुस्तिका ” किसान आंदोलन की हक़ीक़त” का लोकार्पण साइंस कॉलेज के अवकाशप्राप्त प्रोफ़ेसर एस के गांगुली के कर कमलों द्वारा किया गया।
चंद्रशेखर सिंह की स्मृति सभा में मौजूद प्रमुख लोगों में थे- प्रो एस. के गांगुली, अधिवक्ता मदन प्रसाद सिंह, जीतेन्द्र कुमार, राकेश कुमुद, सरोज, सुमन्त शरण, सुनील सिंह, के.डी यादव, जयप्रकाश, पुष्पेंद्र शुक्ला, रामलला सिंह, नन्दकिशोर सिंह, उमा जी, लड्डू सिंह, कारू प्रसाद, राजीव रंजन, भोला प्रसाद सिंह, कपिलदेव वर्मा, रवीन्द्र नाथ राय, ओम प्रकाश सिंह ।

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